कोरिया में अंतिम संस्कार

by Dr. Satish Chandra Satyarthi  - May 5, 2014

आज पहली बार कोरिया में किसी अंतिम संस्कार (장례식) में गया. तीन दिन पहले मेरे प्रोफ़ेसर की माताजी का देहांत हो गया था. दो दिन तक मैं किसी काम में बहुत बिजी था तो आज तीसरे दिन शाम में जा पाया. कोरिया में अंतिम संस्कार का कार्यक्रम साधारणतः तीन दिन का होता है. लेकिन मेरे प्रोफ़ेसर की माताजी का अंतिम संस्कार कार्यक्रम चार दिन का हो रहा है. कोरियाई अंतिम संस्कार में मृत व्यक्ति के पार्थिव शरीर को 3 या 4 दिनों तक अंतिम संस्कार-गृह (장례식장) में रखा जाता है जिससे कि जानने वाले लोग आकर मृतात्मा को श्रद्धांजलि दे सकें और शान्ति के लिए प्रार्थना कर सकें. लेकिन मृत शरीर को दर्शन के लिए खुला नहीं रखा जाता है.

मृत्यु के बाद शरीर को अच्छी तरह सुगन्धित जल से नहलाया जाता है और फिर हाथ पैर के नाख़ून अच्छी तरह काट के, बालों को कंघी कर के, अच्छे कपडे पहनाकर ताबूत में रखा जाता है. फिर ताबूत के सामने एक पर्दा लगाया जाता है और परदे के आगे एक मेज पर मृत व्यक्ति की एक तस्वीर राखी जाती है. लोग आकर तस्वीर के आगे प्रार्थना करते हैं और सफ़ेद गुलदाउदी के फूल (Chrysanthemum flowers; 국화) अर्पित करते हैं. तीसरे या चौथे दिन शरीर को परिवार के पारंपरिक समाधि स्थल पर अन्य पूर्वजों के बगल में दफना दिया जाता है. लेकिन दफनाने की प्रक्रिया में सिर्फ परिवार और नजदीकी संबंधी ही शामिल होते हैं.

कोरिया में अंतिम संस्कार में जाने के लिए ड्रेस कोड भी होता है – ब्लैक फॉर्मल सूट, यहाँ तक की मोज़े भी काले होनें चाहिए. जाने वाले मृतक के परिवार को एक सफ़ेद लिफ़ाफ़े में कुछ पैसे (조의금) भी देते हैं. कोरिया में अंतिम संस्कार में बहुत पैसे खर्च होते हैं इसलिए पहले से ही दुखी परिवार को धन देकर सहायता करने का आइडिया मुझे अच्छा लगा. यह रकम एक रजिस्टर में नोट की जाती है और बाद में रकम देने वाले के घर में शादी-व्याह या कोइ अन्य समारोह होने पर उसी अनुपात में रकम गिफ्ट की जाती है. मृतक के परिवार वाले भी काले कपड़े पहनते हैं. साधारण तौर पर मृतक का बड़ा बेटा सांग्जु (Sangju; 상주) की भूमिका अदा करता है; यानि सारे रीति रिवाजों को मुख्य रूप से वही निभाता है. मृतक के परिवार वाले अपनी वाहों पर एक सफ़ेद रिबन बांधते हैं जिससे परिवार वालों को बाकी लोगों से अलग पहचाना जा सके.
जब मैं अंतिम संस्कार-गृह (장례식장) में पहुंचा तो मुख्य हॉल में एक इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले बोर्ड लगा था जिसपर उस दिन जन लोगों का अंतिम संस्कार हो रहा था उनकी लिस्ट आ रही थी. वहीं बगल में एक मेज पर सफ़ेद लिफाफे और कलम रखी थी. मैंने एक लिफ़ाफ़े में पैसे रखे और उस हौल की और गया जहाँ मेरे प्रोफ़ेसर साहब की माताजी का संस्कार हो रहा था.
Korean Funeral 1

जहां पार्थिव शरीर रखा होता है उस कक्ष के अन्दर और बाहर पारंपरिक कोरियन कैलीग्राफी में मृतक के लिए प्रार्थना और अच्छी बातें लिखी होती हैं. उसके अलावा संबंधी और जानने वाले लोग फूलों के बहुत बड़े बड़े गुलदस्ते और बैनर भी  रख जाते हैं. चूँकि मेरे प्रोफ़ेसर कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं इसलिए उनके जानने वालों की संख्या भी उतनी ही ज्यादा है. इस कारण गुलदस्तों और बैनरों की लाइन लगी थी. कक्ष के बाहर एक डेस्क पर दो लोग बैठे थे और एक रजिस्टर रखा था. मैंने वहां जाकर पैसे का लिफाफा जमा किया और रजिस्टर में अपने दस्तखत कर दिए.

उसके बाद मैं जूते उतार कर हॉल के अन्दर गया. दरवाजे पर ही एक लड़की ने मुझे सफ़ेद गुलदाउदी फूलों का एक गुच्छा हाथ में दे दिया. सामने मेज पर माताजी की तस्वीर रखी थी और उसके दायीं और मेरे प्रोफ़ेसर यानी मृतक के सबसे बड़े पुत्र खड़े थे. सबसे पहले मैंने मेज पर रखी माताजी तस्वीर के आगे फूल चढ़ाए, झुक कर प्रणाम किया और खड़े होकर दो मिनट तक प्रार्थना की. फिर दायीं और मुड़कर अपने गुरूजी को झुक कर प्रणाम किया. वहाँ बोलना कुछ नहीं होता है. बस एक सम्मान और सांत्वना भरी चुप्पी काफी होती है. गुरूजी ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथ में लेकर कर एक तरह से आने के लिए आभार प्रकट किया. फिर कहा कि खाना खाकर जाना.

Korean Funeral 2

वहीं बगल में भोजन करने की जगह थी जहाँ आने वाले लोग प्रार्थना करने और सांत्वना देने के बाद जाकर भोजन कर रहे थे. यह भोजन भी लगातार 3-4 दिन तक चलता रहता है. मैंने जाकर अपने डिपार्टमेंट के कुछ और छात्रों के साथ हल्का सा खाना खाया फिर वहां लोगों को खाना खिलाने में मदद करने लगा. डिपार्टमेंट के बहुत सारे छात्र-छात्राएं वहां काम में लगे थे. चूँकि गुरूजी का माताजी की उम्र भी काफी थी और एक भरी-पूरी ज़िंदगी जीकर अच्छे से गुजरी थीं इसलिए वहां पर ऐसा कोई ग़मगीन माहौल नहीं था. लोग अच्छे से हँसते गपशप करते हुए खाना खा रहे थे.

Korean Funeral 3

मेरा सौभाग्य रहा है कि मेरे गुरुओं का मुझपर हमेशा स्नेह रहता है. वर्तमान प्रोफ़ेसर साहब का मुझपर कुछ विशेष प्रेम रहता है. उन्हें पता है कि बीफ-पोर्क वगैरह न खाने के कारण मुझे कोरिया में खाने की बड़ी समस्या है. इसलिए जब भी मिलते हैं तो ये जरूर पूछते हैं कि खाना वगैरह ठीक से खा पी रहे हो न? तबियत-वगैरह  ठीक है न? आज भी जब मैं वहां काम में लगा था तो वे अपनी जगह से निकल कर भोजन वाली जगह पर आये और मुझे बुला कर पूछा कि खाना ठीक से खाया या नहीं; तुम्हारे खाने लायक तो ज्यादा कुछ होगा भी नहीं. मैंने बोला, नहीं सर, भर पेट खा लिया., बहुत कुछ था खाने को. फिर भी वो वहां किचेन वाले को बोल के गए कि इसको अलग से फ्रूट सलाद वगैरह बनाकर दो, ये मीट नहीं खाता है. ये अलग बात है कि मैंने बाद में कुछ खाया नहीं पर उनके स्नेह से मन अभिभूत हो गया.

अगर आप कोरिया में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं तो इन लिंक्स पर जा सकते हैं:
http://www.seoulsite.com/survival-faq/a-korean-funeral/

http://askakorean.blogspot.kr/2008/02/dear-korean-i-just-found-out-that-my.html

http://www.eslpost.com/info/faq_qanda.php?id=160

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Dr. Satish Chandra Satyarthi

Dr. Satish Satyarthi is the Founder of CEO of LKI School of Korean Language. He is also the founder of many other renowned websites like TOPIK GUIDE and Annyeong India. He has been associated with many corporate companies, government organizations and universities as a Korean language and linguistics expert. You can connect with him on Facebook, Twitter or Google+

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